Most of students search over Google for Haryana Board (HBSE) Important Questions 2026. Here is the Main reason because HBSE Board Says that in HBSE Exam 2026 (last 3 Years of Questions will Repeat) so that here are the selected List of Questions of Haryana Board For Class 12
HBSE Class 12 नैतिक शिक्षा Important Question Answer 2026
Chapter 1 – दुर्बलता छोड़ो – दृढ़ता अपनाओ
प्रश्न 1. जीवन-पथ पर सफलता पाने के लिए क्या जरूरी है? Most Important
उत्तर – जीवन रूपी पथ पर सफलता पाने के लिए मजबूत मनोबल का होना बहुत जरूरी है। यदि मनुष्य का मन स्वस्थ, शान्त, स्थिर, एकाग्र और विश्वास से भरा हुआ है तभी मनुष्य अपने शरीर से कुछ अच्छा कार्य कर सकता है और जीवन-पथ पर सफलता पा सकता है।
प्रश्न 2. भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सांकेतिक भाषा में क्या समझाया?
उत्तर – भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सांकेतिक भाषा में समझाया कि यदि मनुष्य का हृदय दुर्बल हो जाता है, तब महाबलशाली पुरुष भी कमजोर पड़ जाता है। कमजोर हृदय या मन के कारण ही शरीर भी लड़खड़ाने लगता है। अतः उसे अपने हृदय की दुर्बलता त्यागकर युद्ध करना चाहिए।
प्रश्न 3. जीवन में आगे बढ़ने के लिए सुख-साधनों की तुलना में मजबूत मनोबल अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। पाठ के आधार पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर – जीवन में आगे बढ़ने के लिए मजबूत मनोबल (दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास) सुख-सुविधाओं से अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही विपरीत परिस्थितियों में आगे बढ़ने की प्रेरणा और लक्ष्य प्राप्त करने की क्षमता देता है। मजबूत मनोबल व्यक्ति को कड़ी मेहनत करने, धैर्य रखने और अपने लक्ष्य के प्रति पूरी तरह से समर्पित रहने के लिए प्रेरित करता है। सुख-सुविधाएं अस्थायी हो सकती हैं और जीवन की चुनौतियों का सामना करने में हमेशा पर्याप्त नहीं होतीं, जबकि मजबूत मनोबल एक आंतरिक शक्ति है जो किसी भी स्थिति से उबरने में मदद करती है।
Chapter 2 – दुविधा से ऊपर उठो
प्रश्न 1. ‘गीता’ की व्यावहारिक सोच मनुष्यों के लिए किस प्रकार लाभकारी है?
उत्तर – ‘गीता’ के दूसरे अध्याय में कछुए के उदाहरण से यह सन्देश दिया गया है कि हमें बुराई की आहट पाते ही अपनी इन्द्रियों को उसी तरह समेट लेना चाहिए जैसे भय की आहट पाकर कछुआ अपने अंग समेट लेता है। गीता की यह व्यावहारिक सोच मनुष्यों को बुरा न बोलने, बुरा न सुनने, बुरा न देखने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थों का सेवन न करने तथा कुसंगति से दूर रहने का संदेश भी देती है। अतः ‘गीता’ की यह व्यावहारिक सोच मनुष्यों के लिए अनेक प्रकार से लाभकारी है।
प्रश्न 2. सात्त्विक और स्वास्थ्यवर्धक भोजन करने के क्या लाभ हैं?
उत्तर – सात्त्विक और स्वास्थ्यवर्धक भोजन करने से हमारा शरीर स्वस्थ तथा हृष्ट-पुष्ट रहता है। यदि हमारा शरीर स्वस्थ और मजबूत होगा, तभी हम अपने अन्दर की ऊर्जा को अच्छे कार्यों में लगाकर जीवन को सफल बना सकते हैं।
प्रश्न 3. आत्म-अनुशासन के द्वारा मनुष्य अपने जीवन को किस प्रकार सफल बना सकता है?
उत्तर – ‘आत्म-अनुशासन’ शब्द का अर्थ है- स्वयं पर अनुशासन या नियंत्रण। यदि मनुष्य अपने मन एवं अन्य इन्द्रियों का केवल सदुपयोग करता है और बुराई की दशा में उनपर नियंत्रण रखता है, तब इसे आत्म-अनुशासन कहा जाता है। आत्म-अनुशासन के बल पर ही मनुष्य कुसंगति से बच सकता है, हानिकारक पदार्थों का सेवन करने से बच सकता है। वह अपने मन को एकाग्र करके अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनी पूरी शक्ति व ऊर्जा लगा देता है। इस प्रकार आत्म-अनुशासन के द्वारा मनुष्य अपने जीवन को सफल बना सकता है।
Chapter 3 – सन्तुलित जीवन
प्रश्न 1. अनुकूलता और प्रतिकूलता में हमें किस प्रकार का संयमित व्यवहार करना चाहिए?
उत्तर – (क) अनुकूलता में हमारा संयमित व्यवहार-
(क) यदि परिस्थिति हमारे अनुकूल हो, तब हमें अधिक उतावला नहीं होना चाहिए।
(ख) तब हमें आवश्यकता से अधिक उत्तेजित, प्रसन्न तथा अति आत्मविश्वासी नहीं होना चाहिए।
(ख) प्रतिकूलता में हमारा संयमित व्यवहार-
(क) यदि परिस्थिति हमारे प्रतिकूल हो, तब हमें अपना धैर्य बनाए रखना चाहिए।
(ख) हमें अपना उत्साह नहीं छोड़ना चाहिए।
(ग) हमें सहनशीलता का त्याग नहीं करना चाहिए।
(घ) हमें मन में निराशा, हताशा व उदासी के भाव नहीं पनपने देने चाहिएँ।
Chapter 4 – कार्य में कुशलता लाएँ
प्रश्न 1. पाठ के आधार पर बताएँ कि प्रेम और मोह में क्या अंतर हैं?
उत्तर – ‘कार्य में कुशलता लाएँ’ पाठ के आधार पर हम कह सकते हैं कि प्रेम और मोह में निम्नलिखित अंतर हैं-
(क) प्रेम में मनुष्य को दूसरों के सुख की चिन्ता होती है, जबकि मोह में मनुष्य अपनी सुख-सुविधा की चिंता करता है।
(ख) प्रेम में मनुष्य दूसरे लोगों के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन करता है, जबकि मोह में मनुष्य दूसरे लोगों से सुख की उम्मीद रखता है।
(ग) जहाँ प्रेम होता है, वहाँ भय ओर क्रोध का होना आवश्यक नहीं है, जबकि जहाँ मोह होता है वहाँ भय और क्रोध होते ही हैं।
प्रश्न 2. विपरीत परिस्थितियों में भी स्वामी विवेकानन्द अपने किन गुणों के कारण आगे बढ़ते रहे?’ Most Important
उत्तर – विपरीत परिस्थितियों में भी स्वामी विवेकानन्द अपने संयम, धैर्य, निर्भीकता और आत्मविश्वास के गुणों के कारण आगे बढ़ते रहे।
प्रश्न 3. ‘गीता’ में सच्चा कर्मयोगी किसे कहा गया है और क्यों?
उत्तर – ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में सच्चा कर्मयोगी उस मनुष्य को कहा गया है जो अपने प्रत्येक कर्म को उचित ईमानदारी और पूरी निष्ठा से करता है। जो अपने प्रत्येक कर्म को पूरी क्षमता व योग्यता से करता है। जो अपने कर्म को न तो छोटा या बड़ा समझता है और न ही उसमें किसी प्रकार का दिखावा करता है। इसका कारण यही है कि ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में कर्मों में कुशलता को ही योग माना गया है। सच्चे कर्मयोगी के उपर्युक्त लक्षण ही वास्तव में कर्मों में कुशलता को दर्शाते हैं।
Chapter 5 – शांत मन-उन्नत जीवन
प्रश्न 1. वह कौन-सी शक्ति है जो प्रत्येक स्थिति व परिस्थिति में एक समान रहती है? हमारे मन पर उसका आधार क्यों होना चाहिए?
उत्तर – परमात्मा वह शक्ति है जो प्रत्येक स्थिति व परिस्थिति में एक समान रहती है। हमारे मन पर उसका आधार इसलिए होना चाहिए क्योंकि-
(क) प्रतिकूल परिस्थिति उत्पन्न होते ही या उत्पन्न होने की आशंका से ही हमारा मन अस्थिर होने लगता है।
(ख) अस्थिर मन से हम दुख को अनुभव करते हैं अर्थात् दुखी हो जाते हैं।
(ग) हम सब जीवन में सुख चाहते हैं और सुख तभी प्राप्त होता है जब मन स्थिर हो।
(घ) अतः जब हम अपने अस्थिर मन को सदा स्थिर रहनेवाली सत्ता या परमात्मा का आधार देंगे, तभी हमारा मन मजबूत व शान्त होगा।
प्रश्न 2. हमें मन में क्या नहीं रखना चाहिए और क्यों?
उत्तर – हमें अपने मन में ईष्यां, द्वेष, क्रोध, आवेश, अहंकार, लूटमार, स्वार्थ आदि की कठोरता नहीं रखनी चाहिए। इसका कारण यह है कि जब तक ये कुवृत्तियाँ हमारे मन में रहेंगी, तब तक हम अनेक भौतिक सुख-साधन होते हुए भी दुख व पीड़ा को ही अनुभव करेंगे।
Chapter 6 – संघर्षों में विजय का मार्ग
प्रश्न 1. आज के संदर्भ में गीता की क्या प्रासंगिकता है?
उत्तर – भले ही ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में भगवान् श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध के समय कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य की दुविधा और मोह से ग्रस्त अर्जुन को ज्ञान प्रदान किया था, परंतु यह ज्ञान आज भी प्रत्येक क्षेत्र और संकट में हम सभी मनुष्यों का मार्गदर्शन करता है। अतः आज के सदंर्भ में भी यह ग्रंथ हमें बाहरी परिस्थितियों से लड़ने तथा भीतरी मनोवृत्तियों से संघर्ष करने में सहायता करता है।
Chapter 7 – खेती से अर्जित गौरव और समृद्धि
प्रश्न 1- रघुराज का जन्म कहाँ हुआ ? उन्होंने कौन-सा व्यवसाय अपनाया?
उत्तर – रघुराज का जन्म राजस्थान के अजमेर जिले में हुआ। उन्होंने अपनी तीन-तीन सरकारी नौकरियाँ छोड़कर खेती-बाड़ी का व्यवसाय अपनाया।
प्रश्न 2. अंजलि ने किस विषय में और कब एम.बी.ए. की परीक्षा पास की?
उत्तर – अंजलि ने वर्ष 2007 में इंटरनेशनल बिजनेस में एम.बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की।
Chapter 8 – दुर्गा भाभी
प्रश्न 1. असेम्बली में कब व किसने बम धमाका किया ?
उत्तर – असेम्बली में 08 अप्रैल 1929 को भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने बम धमाका किया।
प्रश्न 2. भगत सिंह व राजगुरु को लाहौर से बाहर निकलने में दुर्गा भाभी ने किस प्रकार मदद की ?
उत्तर – योजना के अनुसार रात को भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव दुर्गा भाभी के घर पहुँच गए। फिर प्रातः भगत सिंह ने क्लीनशेव होकर, अंग्रेजी फैल्ट टोपी धारण की तथा शची को गोद में लेकर रेलवे स्टेशन की ओर चल पड़े, उसके पीछे दुर्गा भाभी ऊँची हील की सैंडिल पहने, पर्स लटकाए मेम साहब बन कर चल पड़ी, उन दोनों के पीछे-पीछे राजगुरु नौकर बनकर चले। रेलवे स्टेशन पर पहुँचकर भगत सिंह व दुर्गा भाभी पति-पत्नी के रूप में प्रथम श्रेणी के डिब्बे में तथा राजगुरु तृतीय श्रेणी के डिब्बे में सवार हुए। लखनऊ पहुँचने पर राजगुरु उनसे अलग होकर आगरा चल दिए। इस प्रकार उस विकट परिस्थिति में लाहौर से भगत सिंह व राजगुरु को बाहर निकालने का श्रेय दुर्गा भाभी को ही जाता है।
Chapter 9 – सर्वे भवन्तु सुखिनः
प्रश्न 1. वेद में कैसी विचारधारा की कामना की गई है?
उत्तर – सबके मन और विचार एक जैसे हो तथा सभी को समान रूप से शिक्षा मिले।
Chapter 10 – हेमचन्द्र विक्रमादित्य
प्रश्न 1. हेमू ने आदिलशाह के राज्य की सुरक्षा किन-किन विद्रोहियों से की ?
उत्तर – हेमू ने इब्राहिम खाँ मुहम्मद खाँ ताज करांनी, फखरवान नूरानी आदि अनेक अफगान विद्रोहियों की बगावत को कुचल कर आदिलशाह के राज्य की सुरक्षा की।
प्रश्न 2. हेमू को ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि से कब नवाजा गया ?
उत्तर – 1556 में तुगलकाबाद के युद्ध में मुगल सेनाओं को परास्त करने के बाद स्वयं आदिलशाह ने दिल्ली का राजसिंहासन हेमू को सौंप दिया तथा उन्हें ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि से नवाजा।